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भारतीय राजनीती का सच

भारत एक ऐसा देश जहा विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र वास करता है। अब लोकतंत्र है तो उसे चलाने के लिए एक निर्धारित सरकार चाहिए।  सरकार है तो एक विपक्ष भी होना चाहिए। 

क्या आप को पता है भारत में कुल कितनी पार्टिया है। भारत निर्वाचन आयोग के नवीनतम प्रकाशन (2019) के अनुसार, पंजीकृत पार्टियों की कुल संख्या 2698 थी, जिसमें 8 राष्ट्रीय दल, 52 राज्य दल और 2638 गैर-मान्यता प्राप्त दल थे। 

आज जहा मौजूदा समय में बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी ) की सरकार है वही विपक्ष में बाकि 7 राष्ट्रीय दल जिसमे सबसे मजबूत विपक्ष के नाम पर कांग्रेस और त्रिमूल कांग्रेस के नाम शामिल है।

भारत में राजनीती को एक अलग नजरिये से देखा जाता है। पार्टियों और राजनेताओ के किये हर एक वादे को सच मान कर हम वोट देते है और एक सरकार चुनते है। सरकार में आने के बाद नेता अपने वादे को भूल अपनी जेबे और घर भरने में लग जाते है। भारत में राजनीती को एक धंधे के तौर पर माना जाता है।  हमारे यहाँ जब कोई नेता विधायक बनता है तो उसकी आने वाली कई पुस्ते आराम से उन सेवाओं का लाभ उठाती है जो उनके पूर्वजो को विधायक के तौर पर मिली थी। जहा एक आम नागरिक अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा सरकार को टैक्स के तौर पर देता है। वही एक नेता को जिसकी पगार ही हमारे दिए हुए टैक्स और खर्चो से आती है उसे सारी सुविधा मुफत में दी जाती है। चाहे वो बिजली का बिल हो या फिर रहने के लिए घर, एक आम नागरिक को ये पाने में सालो लग जाते है। जिसके लिए हम सारा जीवन संघर्ष करते है। वो सुविधा नेताओ और उनकी पुश्तों को आजीवन प्राप्त होती है। 

जैसे जब किसी के परिवार में कोई व्यवसाय उसके पिता जी शुरू करते है उसके बाद उसकी विरासत उसके बेटे को , उसके बाद उसके बेटे को दी जाती है वैसे ही हमारी राजनीती का भी हाल है। राजनितिक पार्टियों का ये हमेशा से रहा है कि अगर पार्टी सरकार में आती है तो उसका नेतृत्व सिर्फ एक ही परिवार के लोग ही करंगे, चाहे आप कितने ही सक्षम क्यों न हो परन्तु राज केवल राजा का पुत्र ही करता है कोई और नहीं। 

भारत कि राजनीती में बहुत से ऐसे भी लोग रहे जिनकी समझ और कुशलता को हर किसी ने माना तो पर कभी उन्हे अपनी कुशलता साबित करने का मौका नहीं दिया गया और यही कारण रहा है कि भारत कभी अपनी राजनीती के सुनहरे दौर में गया ही नहीं। हमारे यहाँ के पक्ष और विपक्ष कभी भी किसी बात पर एक साथ नहीं होते। माना एक बेहतर राजनीती के लिए मजबूत विपक्ष का होना अनिवार्य है।  परन्तु क्या उस समय भी जब पुरे देश को एकजुट होने कि जरुरत हो?

आज राजनीती का स्तर इतना निचे गिर चूका है कि अपने आप को बेहतर साबित करने के प्रयास में लोगो को गुमराह करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी जा रही है। कही कोई धर्म को खतरे में बता रहा है तो कोई लोकतंत्र को ही खतरे में बता रहा है। बात सिर्फ यही पर ख़त्म नहीं होती इस सब में अगर कोई सबसे बड़ा दोषी है तो वो हम है। हम आज इस कदर गुमराह हो चुके है कि किसी की भी बातो में आ जाते है और अपने देश को बदनाम करने और उसे नुकसान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते है। चाहे वो दिल्ली दंगे हो या गुजरात दंगे। 

मेरे कुछ सवाल है खुद से भी और आप से भी, क्या सच में आज लोकतंत्र खतरे में है ?, क्या सच में आज सरकार सिर्फ अपनी भलाई सोचती है ?, क्या सच में कोई है जिससे हमारे धर्म,समाज और संस्कृति को ख़तरा है ?


ये मेरे अपने व्यक्तिगत विचार है| इससे अगर आप की कोई भावना आहत हुई है, तो आप से माफ़ी चाहूंगा। आप चाहे तो अपने विचार कमेंट में लिख सकते है।    

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